Tuesday, August 12




वोह दिन...



कुछ पुराने पन्नो में
कुछ
सिरहानों के तले
बदलती ज़िन्दगी के मायनों से रूबरू
हमसे
नासार मौसम सो गए हैं

कुछ
थे हमने संभाले
कुछ
दिए थे तुम्हे
मगर इस खामोशी में सराबोर
वोह लम्हे खो गए हैं

जागती सी कुछ रातों
में
बहकती हवा के इशारों पे
मुन्तज़र
हम खो गए हैं

यादों
में तुम्हे तलाशते
और
तुम में ख़ुद को खोजते
हम
कितनी रातें रो गए हैं
पाने
चले थे प्यार ज़िन्दगी में
और
ज़िन्दगी के हो कर रह गए हैं

मगर आज यह दीवार
मैं गिराता हूँ
तुम्हे
भूलने की कोशिश में नाकामयाब
तुम्हे
ख़ुद के और भी करीब पाता हूँ

कहता हूँ
खामोश बन सह जाता हूँ
कुछ
मन में बुदबुदाते
ख्यालों
को सपनों में जगाता हूँ

उन दिनों की खोज में
कुछ
गुमसुम रातों में
जब
जाता हूँ दरवाज़े पे दस्तक देती
तुम्हारी
हर याद से मैं मिल जाता हूँ

भावनाओं
ने कुछ कहा है तुमसे
और उस जागते अतीत से
जिससे
मुखातिब हैं कुछ थमी साँसे
हमारे
बिताये हुए पल कुछ ऐसे ही हैं

खामोश पानी पे बिखरे
मोतियों के समान
ज़िन्दगी
के तराजू पे तुलता
खोया
हर एक अरमान...

1 comment:

  1. Inhi tanhayion k saath gharonde banate ja rahe hai.. Is baat ka gam nahi k tum aaoge.
    gum hai, khamosh hai..
    in tanhayion me tanha rehte ja rahe hai..

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