Saturday, October 3




अंकुश

उठते कुछ सवालों के साथ
बीते कुछ इरादों के सहारे
पानी में बहते कुछ तूफानों के बीच
हमने भी अपने इरादे उतारे

ज़मीन से फलक तक
खाव्हिशों की झलक तक
बिखरे कुछ पल, जो कल थे हमारे



कही अनकही और सुनी अनसुनी
और जो कह के भी
समझ पाये, कुछ ऐसे थे इशारे

जाने पहचाने, अपने बेगाने
ज़िन्दगी के नजराने
और कुछ बेखुदी के पैमाने

खो कर मिल जाने
और कुछ महफूज़ ख़ज़ाने

आज ज़िन्दगी की कशमकश में कितने
अनदेखे थे और अब हैं कितने अनजाने

चुप रहकर सोचें तो कितने गम हैं
बाहें फैलाये इस अँधेरे में आखिर कितने रंग हैं?

और कह कर अगर जग जायें रातें
तो सूरज बन क्या कल जग जायेंगे...

इस अंकुश से हर सवाल तक बढ़ते सब कदम हैं
न आये आंधियां तो भी ज़िन्दगी क्या पूरी है?

दूरियां और फासले खुद से भी क्या उतने ही ज़रूरी हैं?

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