एक अधूरी सी कविता
एक टूटा विचार
शब्दों की कैफियत
एक बदलता संसार
एक खोया समय
एक बिछड़ी घडी
ज़िन्दगी की कसौटी
पे वक़्त के बदलते आसार
कुछ गूंजती आवाजें
खामोशियाँ कुछ
कुछ बहते से आकर
खोयी हुई परछाई
मैली एक दीवार
धुन्दला सा सबका प्यार
क्यूँ कुछ सुनना है
किस से छुपाया है
और किस तक पहुँचाना है
जो गुप्त है उसपे निशाना है
और जो ज़ाहिर... खैर पुराना है
मेरे तेरे में क्या पराया है?
जो नहीं खोया क्या उसे गवाया है?
ख्यालों से लड़ते तुम पर बिगड़ते
दुनिया में बढ़ते
ऐसे क़दमों पर कहाँ था संसार
आँसुओं की भी अपनी रफ़्तार है
जो बहते हैं धुल जाते हैं
नहीं धुलता तोह ये खुरदरा संसार
खुद से खुद को न कर पाए अलग
तुम से खुद को लेकिन कर दिया जुदा
और अब खुद से कुछ खुद ही अनजाने हैं
पहचाने कुछ चेहरे हैं पर लगते बेगाने हैं
हकीकत में पड़ती गिरती संभालती
कुछ पन्नों में ढलती
एक कविता क्या बनेगी इस जीवन का सार
शून्य से बने हम
शून्य से बना संसार
शून्य बन ढले हम
शून्य जब बना आकार
