Tuesday, July 6



हासिल


आज फिर से नींद गवा बैठे
बंद आँखों में सपने सजा बैठे
खोये लम्हे अपने बना बैठे
फासलों को भूल कुछ और करीब हम जा बैठे...

कुछ सोचते कहाँ समझ पाते थे हम 
जो निकली थी दिल से
उन्ही दुआओं पे थे चलते कदम
रास्तों में भी मंजिल सजा बैठे
आज कुछ और खुद को गवा बैठे

चलते रहते तो सारे थे लगते हमें दूर
माँगा नहीं कुछ किया सबको क़ुबूल
सिर्फ एक छोटी सी आहट से बंधे
थे हरदम
आज उसे भी निसार हम कहाँ बैठे

होते थे पहले कई दिनों में वो दिन
जिनमे जागते थे हम भी तारे गिन-गिन
लेकिन आसमान में अब ना हैं
वो तारे शरीख,
जिनके लिए हम सपने जगा बैठे
कुछ लम्हों में ज़िन्दगी बिता बैठे

एक दिन खुद से पुछा ख़ामोशी के बाद
कहते नहीं बनता चुप रह के आज
क्यूँ धीरे धीरे रुकता है वक़्त
कुछ चेहरों के पास

सारे नसीब के आदि है
यूँ तोह ख़ामोशी में भी एक आजादी है 

मन में आशा थी उनसे दूर जाने की
उस अकेलेपन से खुद को बचाने की
मैं निस्संग था पर एकाकी नहीं
मेरा अकेलापन मेरा साकी सही

जो साथ न मेरा दे पाये, उनसे कब सूनी हुई डगर?
मैं भी न चलूँ तो क्या नहीं रहेंगी ये राहें अमर?

यहाँ सब भटकते हैं खुद से दूर जाने को
और हम ढूँढ़ते हैं खुद को पाने के कुछ मक़ाम 

जो चलते हैं, उन्हें चलने का स्वाद है
और ज़िन्दगी हमारी इस परिवर्तन से ही तो आबाद है

और तुम, तुम भी हो एक पहचान 
खुद को खोजने के लिए मेरा अभिमान

भूले बिसरे कुछ शब्द तो  है
उनकी मगर कहाँ कोई पहचान है
अपनों के बीच में भी हम खुद से अनजान है
क्या मोहसिन, और कौन मेहमान है?

नज़र में रहते हो जब तुम नज़र नहीं आते
आओ चलो, अब चलें खुद से दूर...

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