Wednesday, January 4



सर्दी

इस सर्द से मौसम की
अपनी एक मजबूरी है
कुछ जमे से पन्ने में
एक आवाज़ अधूरी है


एक गीत सुहाना था
कहते थे सुनाना था
भूले बिसरे लब्जों में
एक अर्थ अनजाना था

एक शीत की लहर सी
उसमें कुछ हवाएं थी
कुछ राज़ जो गहरे थे
लब पर फिर आये हैं

बिखरे कुछ जो कल थे
वोह आज भी कोरे हैं
अपने जो दो पल थे
यादों में समायें हैं

एक अजीब सी जकड़न है
खुद में जो अड़चन है
सोच पर लेकिन रोक कहाँ
थमी तो बस ये धड़कन है


एक याद पुरानी सी
जान के भी अनजानी सी
कुछ अंगड़ाई लेते पलों को साथ
दे गयी एक कम्पन का एहसास


जगती सी कुछ रातों में
अनकही सी कुछ बातों में
मौसम की इन सौगातों में
तुम ही सी तो ये रस्ते आबाद हैं


अड़े कुछ पलों में
हम खड़े कुछ कलों में
समेटे वो याद जिनमे खो कर
आज भी कुछ यादें हकीकत बन जाती हैं  

कुछ कोरी सी दीवारों पर कल के निशान हैं
जो छुप गयी वो तसवीरें तो नहीं
बचे तो बस कुछ खालीपन के निशान हैं

तुम्हारी बात मान हम अब जल्दी सो जाते हैं
रातों से बाते क्या करें, तारों से छुपते क्या फिरे
बस खुद को खुद से ढूंढ लाते हैं

ज्यादा वक़्त तो नहीं है
बस जम गए कुछ कदम हैं
कुछ चार कदम पर तुम हो
कुछ कल में डूबे हम हैं


कभी फुर्सत में शायद तुम होके आबाद
करोगे उन लम्हों को याद
जिसमे जुड़े थे हम तुम मजबूरी से


सर्दी के मौसम मैं
नमी आँखों में लिए कुछ दूरी से...






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