अक्स
रुक, थम जा, थोडा ठहर
रात अभी बाकी, जवां है
गश्त पे निकले अरमां अभी हैं
यादों का पहरा जहाँ है
कुछ सिले, कमज़ोर
तेरी आवाज़ के साए निकले
दिल पे रखे हाथ
जब हम घर लौट चले
खाली खाली रास्तों पे
दूरी को बयान करते चले
भूले जो तुम अपनी सौगात
गए दूर अकेले क़ैद करके हमारे हालात
मंजिल से मंदिर तक
साए जो मिले सब एकाकी थे
कमी न वक़्त की थी न ज़िन्दगी की
बस सडकों पे निकले बैरागी थे
खोजते तो शायाद एक आशना
उन अजनबियों में भी ढून्ढ लेते
जो अपने किले हमें देख रेत कर चले थे
मिलना मगर तुमसे इस वक़्त यहाँ था
बुनते कुछ लम्हों को अपने ज़हन में आज
कोरे कुछ पन्ने आशाओं के पार
ज़िन्दगी और दिलकशी मिल चली
जहाँ दिखा तेरा अक्स निंदिया के पार
