
पंछी हूँ ...
उड़ने चला,
मैं हवाओं में समाने चला
रस्ते खुले
मैं तो चलता चला...
तुम ना मिले
मंजिलें घुल गई
मैं ख़ुद को भुला
और जो पाया नही था
उसी खोज में ख़ुद
को भूल चला
मंजिलें नही
रास्ते ही सही
रास्तों में मुसाफिर सा
चलता चला
साथी नही
है, तोः बस एक एहसास
गम भी नही
कैफियत से तृप्त है हमारी प्यास
कभी न मिटने वाली
वो आस
जिसे संजोये
सोचते हैं हम
की क्या पाए बिना
हम तुम्हे खो पाएं हैं
उड़ान के दायरे
में है तुम्हारा घर
जिसमें से झांकती
है तुम्हारी खामोश नज़र
तुमने कह दिया तोह
ग़म के क्या पैमाने हैं
जो सब खमोशी में
सुन गए
क्या वोही सच में सयाने हैं?
दुःख की न तकलीफ
की इनायत है
आने वाले पलों
के मौसम सुहाने हैं
क़ैद पिंजरों में
आज़ादी के मायने हैं
खुले आस्मान
केतोः रहनुमा सितारे हैं
उड़ान उन उन्मुग्द
परिंदों की ओर
ज़िंदगी है रौशनी उमीदों के साथ
यादों की मिटटी में
कितने दिन दिल बेह्लायेंगे
थोडी दूर तुम ले चलोगे
कुछ रास्ता हम ख़ुद बनायेंगे
थोडी दूर उड़
आकाश के सब संगी
बचपन के कुछ पंखों
पर सपनों सा कुछ दर्द पाले
कहाँ जायेंगे
इंतज़ार करना ज़मीन
हमारी शिद्दत की कसम
एक और आशियाँ हम बनायेंगे ...
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