Saturday, May 17



सवाल


कुछ अनकही बातों में
कुछ अनसुनी हवाओं में
कहते हैं , भूलेंगे हम
उनको अपनी ही निगाहों में

रास्तों में
दिशाओं में
मिलने की कैफियेत है
अपनी परछाई से ...

उस तन्हाई से
जिसे सोचा था हमने
पीछे छोड़ आए हम ...

मिलने को निकले थे
घर से परिंदों से,
मिलते रहे खुशनुमा हवों से
आए कई रास्तों मे
फ़रिश्ते थे
कहते रहे हमसे ठोकर है
राहों में

कुछ पल उस चेतना में बिखर
खोजा तोः हमने सिसकती आहों में
मगर आर या पार कोई बतलाता
हमें ठहर,
अच्छा नही हर डगर पर
अगर-मगर

कहने को तोः मुझे उस पल के याद
सताती है
कोई रुत मौसम
एक अरसा हुआ है ख़ुद को खोये
मगर चिंता में हर प्रार्थना
याद तुम्हारी लाती है

अब यहाँ कौनसी रौशनी है
जो ख़ुद बिजली बन मन बहलाती है?
सब तोः हैं ऊर्जा से भयभीत
किस्से कहें
हमें रात नही भाती है ..

ग़म मिलते तोः निखारती थी दुनिया
यह बुनियाद तो उन दीवारों से थी
अच्छा किया जो चुरा लिए सपने
रहते शिकार पर तोः टूटे थे ज़रूर

जब हो सकी बात तोः
हमने येही कह दिया
''यूं हमसे रूठ के जाने का शुक्रिया''
और वह हंस कर चल भी दिए

असमंजस के क्षणों
ने बिजलियों को आग में
बदलने ना दिया

रात भर सोचते रहे हम कैसे कहें
और उस एक नज़र ने हमें रोने भी ना दिया

आभी-अभी खोये हैं वादे
अगर मिलके उड़ लें संग
तोः शायद आस्मान को ज़मीन से मिलादे ...

जिनको लाँघ कहा था हमसे
मधुर प्रतीक्षा के इस जलसे में
मंजिलों के खोज तो तुमसे ही है

तृप्त होने से पहले हो सके तो एक बार
मिलकर हमसे कर लेना सवाल सारे

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