Wednesday, August 14


जाने दे


तुम तक
बस तुम तक
सारी मंजिलें 
सब रास्ते थे सीमीत 
बस तुम तक

अब तुम नहीं
तो नींदें धुआं हैं 
आँखें हैं बोझल 
सूना जहाँ है 

है आँखों में अब भी वो तस्वीर 
माना था जिसे खुदा 
जिससे किया दिल को ताबीर
और किया खुद को नफा

अब धडकनों में रूककर
तकदीर से झुक कर
आशाओं से मूक कर 
किया अलविदा कुछ अपनों को 

खुद क़त्ल कर कुछ सपनों का 
दहन किया हमदर्दी का 
आंसुओं में खोये जो थे
उनको भी कहा अब जाने दो

लम्बी नहीं ज़िन्दगी 
तो पल छोटे क्यूँ कर लें
इनमें जी कर
फिर चाहे जितने मौतें मर जायेंगे  

मर मिटे अभी हैं 
साँसों को पता नहीं 
थम कर अब बस
करना इंतज़ार है 

सिर्फ कुछ करना ही स्वीकार था हमको 
चुप रह कर बनती बात न थी
अब ख़ामोशी में लिपटे
मिटटी के इंतज़ार में 
शब्दों को ढूँढने बोलो कहाँ जाएँ?

सामने तो हो तुम
खुद में मगर तुम कहाँ
चाहा था जिसको तुममें
उसको ढूँढने बोलो अब किधर जाएँ?

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