Monday, March 18



उड़ान 


दूर है अभी मंजिल
सांस फिर क्यूँ 
भर आई है 

इतनी तो गुजरी नहीं उम्र 
यादों में बन जो 
आँखों से मुरझाई है 

 साकी भी अभी फलक से दूर है
दूरी उसे भी कहाँ मंज़ूर है
शिद्दत मैं लेकिन अपनी 
हर इंसान को गुरूर है

मैं तोह अपने पंखों में उलझा 
नदियों में बहता 
बातों में ढलता 

चलता नहीं हूँ
दुनिया भागती है
फिर रुकता नहीं हूँ
सांस भर आती है 

इधर से उधर से
राहें बुलाती हैं
क़दमों के निशान तो हैं
पर ज़िन्दगी फिर भी बाघी है 

कितना दूर भागा
और किस्से भाग पाया
अपने साए में लिपटा
बस एक भीगा एहसास

पंख अब खुले हैं
उड़ने को खुला आसमान है
अभी जो ज़मीन से उठा हूँ 
क़दमों के बाकी क्यूँ निशाँ हैं 

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