दूर है अभी मंजिल
सांस फिर क्यूँ
भर आई है
इतनी तो गुजरी नहीं उम्र
यादों में बन जो
आँखों से मुरझाई है
साकी भी अभी फलक से दूर है
दूरी उसे भी कहाँ मंज़ूर है
शिद्दत मैं लेकिन अपनी
हर इंसान को गुरूर है
मैं तोह अपने पंखों में उलझा
नदियों में बहता
बातों में ढलता
चलता नहीं हूँ
दुनिया भागती है
फिर रुकता नहीं हूँ
सांस भर आती है
इधर से उधर से
राहें बुलाती हैं
क़दमों के निशान तो हैं
पर ज़िन्दगी फिर भी बाघी है
राहें बुलाती हैं
क़दमों के निशान तो हैं
पर ज़िन्दगी फिर भी बाघी है
कितना दूर भागा
और किस्से भाग पाया
अपने साए में लिपटा
बस एक भीगा एहसास
पंख अब खुले हैं
उड़ने को खुला आसमान है
अभी जो ज़मीन से उठा हूँ
क़दमों के बाकी क्यूँ निशाँ हैं

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