Monday, December 10



मुसाफिर 


चल मुसाफिर 
चला आ यादें समेटे 
इस छोटे से दिल में 
दुनिया समेटे 

सपनों का क्या है 
चल चला चल वादे समेटे 
तेरा यहाँ क्या 
क्या तेरा यहाँ हैं 
मिटटी में मिटते
सारे निशान हैं 

पानी पे बिखरे तेरे लफ्ज़ 
सिमटते कहाँ आशाओं में 
काली से वो रातें जो थी 
उनके पार जाना है 

किस्से हैं कितने 
कितने मक़ाम हैं 
बैठा जहाँ तू 
मंजिल वहां है 

चल राहों पे जिसकी
मंजिल न कोई 
महफ़िल बटोरे
कितने खड़े हैं

कितनो की तुने 
दुनिया है जोड़ी 
दुनिया कितनो की 
तेरे कदम हैं 

मुड मुड के चल तू 
गिरे तो संभल तू 
आँखों को मूंदे
सांसें निगल तू 

चलना है तुझको 
पीछे हैं साए 
आंसुओं से आगे 
कदम जहाँ तेरे ले जाए



No comments:

Post a Comment

Thank you for your comments!