Sunday, October 14



ज़िन्दगी 

आ चल बांट लें
ज़िन्दगी ये पूरी 
थोड़ी तुम्हारी,
बाकी अधूरी
गुमसुम सी बातें,
रातों की बातें
वोह बातें जो
कभी न हो पाएं पूरी 

कुछ मेरी तरह
कुछ तुम्हारी
सी बातें 
शरमाई सी
कुछ मुस्कुराहटें
सिमटी से उनमें
हमारी ये रातें

ले चल वो यादें,
कुछ मिटटी वो भूरी 
माथे पे रख कर,
मांगी जिनसे दुआ थी

सिमटे कहाँ हैं,
बादल बन उड़े जो
तेरे केसुओं में लिपटे
मेरे लफ्ज़ अधूरे

दामन में सिमटे
तेरी आहट में बैठे
अरमान जो निकले
साँसों सें उड़ कर 

ले चल वहां 
जहाँ रास्ते नये हो 
मंजिल तुम्हारी
मेरी तुमसे ही पूरी

चल दे जा कुछ यादें
अब रातें हैं काली
आँखें है खाली
सपने से बढ़ गयी है दूरी 

ज़िन्दगी तो बहुत है
है कम तो बस सांसें 
सबसे बड़ी है
बस यह जीने की मजबूरी

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