Tuesday, September 11


अंत

कुछ यादों से जुड़े
कुछ लम्हों में खड़े
ज़िन्दगी से कुछ खफा
कुछ तुम पे अड़े

चुप रहकर ज़रा
किया अपने गुस्सा का एलान
जब तुम्हरी ख़ामोशी ने
किया हमें परेशान

वक़्त था वो कठिन
कुछ घड़ियाँ नाफरमान
बिखरते कुछ लम्हे
और कुछ हम नादान

एक अंतर्द्वंद
जिसमे हिम बागी थे
एक कश्ती जिसके हम नावी थे

अच्छे और बुरे का अंतर
कठिन समझ पाना था
दिल में बस एक ही गूँज थी
कुछ कर दिखाना था

मन में था विश्वास
कदमों को मंजिल का आभास
रुकने में था झुकने का डर
गिर के बिखरने का डर

ढूंढे एक ठिकाना
जहाँ न सिफर न बसर
पहुँचने के लिये जहाँ
हमें तो बस चलते जाना

आदतों से आदि
खुद ही लिखते गए अपनी बर्बादी
और चुप रह कर जब न बनी बात
तो लफ़्ज़ों से भी कर दिया आगाज़

तुम से ही शुरू 
तुम से ही आबाद
मेरी ज़िन्दगी की आखरी कड़ी
और हम एक कैदी
अपनी  बंदगी से आबाद 

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