पास
आँखों की आज भुझ्ती नहीं प्यास
दूर हो तुम और हर एक आस
कह भी दें, जो न कहें
चुप जो रहे,
न होंगे पूरे आज
पास तो है सब कुछ
बस दूरी के उतने ही
जितने खुद के रहते थे करीब
चलते हुए चुभते कम हैं
जीते जब तक, तब तक ग़म है
और ग़मों से कुछ हम कुछ तुम पूरे
और कुछ कम है
शामें गयी, पर तू नहीं
बंद आँखों में भी न है वोह यकीन
चुप करके कुछ बता दे आज
कहते कहते तो बोहत बोल गए
मगर सुनते तो आज कहाँ ग़म था ....

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