मगर...
चलते चलते तय किये कितने सफर
यादों में बीते रस्ते अगर
बहती हवाओं के संग मैं भी बहक कर
भूल गया जाना था किस डगर
ख्वाबों ख्यालों में खोजते कई मंज़र
आसमान को तकते
रातें कितनी कर दी सिफर
बादलों की गहराइयाँ मापी कभी,
कभी पानी में बहा दी अपने ख्वाबों की दास्ताँ
रुकते-रुकते चले कभी और कभी
चलते चलते भी रुके कदम
एक ख्वाब की ख़ामोशी थी
एक था अँधेरे का गुमान
कुछ अनकहे वादों में भी था अभी
अपना सवालों का मंज़र
कुछ रात तक हमें लाये थे
कुछ अपने ही पराये थे
कुछ वक़्त यूँ भी था अजीब
की अजनबी अपने ही हमसाये थे
कर के उन वादों की शिनाख्त
हम नए कुछ अरमान भी लाये थे
अगर थी तो बस एक वो कमी
जिसके होने पे हम खोने से घबराये थे
मगर...
मगर वो तो है एक माया अजीब
जिसके कश हमने बहुत घुमाये थे
जो हमसे हैं दूर आज
वोह क्या कभी हमसे मिल पाए थे?

Beautiful...
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