Tuesday, November 4













शायद...

सपनों की परतों में
आसमान के साए हैं
गेहुएं इस मंज़र की तस्वीर
से बेदाराख्त मुरझाएं मौसम
भी अब अपने हमसाये हैं

खुलते-सिमटते अश्कों में हम अशफाक
एक नफीस बज्म उनकी आहटों की लाये हैं
राहों में तोह थे मोती भी
मगर जहाँ नज़र थमी
बस उसी मिटटी की रौशनी,
हम राहगीर बन सिमटे ख्यालों की कश्ती
में बशर कर पाए हैं

मिले नही जो उनसे तोह क्या ग़म
वोह हमारे न भी हो सके
तोह क्या क्या हम उनके कुछ कम हैं?

जिनसे मिले हैं उनसे कितने जुड़ पाये हैं
और जिनको खो दिया ख़ुद की खोज में
उन्हें कैसे यादों से जोड़ पाएंगे?

शायद राह में कही खो दिया ख़ुद को
और कुछ मौसम से बदले रंग
हम कुछ टूटे सपने के हमसाये हैं
कितने आसमान सर पे
और कितने धरती क़दमों पे राहगीर है

उतरती चद्ती इस मिटटी की खुस्बो में
बी हर अक्स का इक इमान है

पूछें कितने ख्यालों से?
सहमे, गुज़रे, कुछ भूले बिसरे सालों से
खोज ये ऐसी जिसमे
खोजने वाले ही सबके भुलाएं हैं

पाने के क्या मायने और खोने
पर कितनी जुस्तजू तृप्त है?
हमसे तो खोज की परिभाषा है
जिसमें जीते तोह भी पाने को
कुछ अजीम, कितनी अनमोल है

फिर चले मूँद आँखें,
पराया सपनो को
खोज में उसकी, जिसने सिखाया मतलब
ज़िन्दगी का...

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