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Wednesday, August 14


जाने दे


तुम तक
बस तुम तक
सारी मंजिलें 
सब रास्ते थे सीमीत 
बस तुम तक

अब तुम नहीं
तो नींदें धुआं हैं 
आँखें हैं बोझल 
सूना जहाँ है 

है आँखों में अब भी वो तस्वीर 
माना था जिसे खुदा 
जिससे किया दिल को ताबीर
और किया खुद को नफा

अब धडकनों में रूककर
तकदीर से झुक कर
आशाओं से मूक कर 
किया अलविदा कुछ अपनों को 

खुद क़त्ल कर कुछ सपनों का 
दहन किया हमदर्दी का 
आंसुओं में खोये जो थे
उनको भी कहा अब जाने दो

लम्बी नहीं ज़िन्दगी 
तो पल छोटे क्यूँ कर लें
इनमें जी कर
फिर चाहे जितने मौतें मर जायेंगे  

मर मिटे अभी हैं 
साँसों को पता नहीं 
थम कर अब बस
करना इंतज़ार है 

सिर्फ कुछ करना ही स्वीकार था हमको 
चुप रह कर बनती बात न थी
अब ख़ामोशी में लिपटे
मिटटी के इंतज़ार में 
शब्दों को ढूँढने बोलो कहाँ जाएँ?

सामने तो हो तुम
खुद में मगर तुम कहाँ
चाहा था जिसको तुममें
उसको ढूँढने बोलो अब किधर जाएँ?

Monday, March 18



उड़ान 


दूर है अभी मंजिल
सांस फिर क्यूँ 
भर आई है 

इतनी तो गुजरी नहीं उम्र 
यादों में बन जो 
आँखों से मुरझाई है 

 साकी भी अभी फलक से दूर है
दूरी उसे भी कहाँ मंज़ूर है
शिद्दत मैं लेकिन अपनी 
हर इंसान को गुरूर है

मैं तोह अपने पंखों में उलझा 
नदियों में बहता 
बातों में ढलता 

चलता नहीं हूँ
दुनिया भागती है
फिर रुकता नहीं हूँ
सांस भर आती है 

इधर से उधर से
राहें बुलाती हैं
क़दमों के निशान तो हैं
पर ज़िन्दगी फिर भी बाघी है 

कितना दूर भागा
और किस्से भाग पाया
अपने साए में लिपटा
बस एक भीगा एहसास

पंख अब खुले हैं
उड़ने को खुला आसमान है
अभी जो ज़मीन से उठा हूँ 
क़दमों के बाकी क्यूँ निशाँ हैं 

Tuesday, September 11


अंत

कुछ यादों से जुड़े
कुछ लम्हों में खड़े
ज़िन्दगी से कुछ खफा
कुछ तुम पे अड़े

चुप रहकर ज़रा
किया अपने गुस्सा का एलान
जब तुम्हरी ख़ामोशी ने
किया हमें परेशान

वक़्त था वो कठिन
कुछ घड़ियाँ नाफरमान
बिखरते कुछ लम्हे
और कुछ हम नादान

एक अंतर्द्वंद
जिसमे हिम बागी थे
एक कश्ती जिसके हम नावी थे

अच्छे और बुरे का अंतर
कठिन समझ पाना था
दिल में बस एक ही गूँज थी
कुछ कर दिखाना था

मन में था विश्वास
कदमों को मंजिल का आभास
रुकने में था झुकने का डर
गिर के बिखरने का डर

ढूंढे एक ठिकाना
जहाँ न सिफर न बसर
पहुँचने के लिये जहाँ
हमें तो बस चलते जाना

आदतों से आदि
खुद ही लिखते गए अपनी बर्बादी
और चुप रह कर जब न बनी बात
तो लफ़्ज़ों से भी कर दिया आगाज़

तुम से ही शुरू 
तुम से ही आबाद
मेरी ज़िन्दगी की आखरी कड़ी
और हम एक कैदी
अपनी  बंदगी से आबाद 

Saturday, July 7




अक्स 


रुक, थम जा, थोडा ठहर 
रात अभी बाकी, जवां है
गश्त पे निकले अरमां अभी हैं
यादों का पहरा जहाँ है


कुछ सिले, कमज़ोर 
तेरी आवाज़ के साए निकले 
दिल पे रखे हाथ 
जब हम घर लौट चले 


खाली खाली रास्तों पे
दूरी को बयान करते चले
भूले जो तुम अपनी सौगात 
गए दूर अकेले क़ैद करके हमारे हालात


मंजिल से मंदिर तक  
 साए जो मिले सब एकाकी थे 
कमी न वक़्त की थी न ज़िन्दगी की 
बस सडकों पे निकले बैरागी थे  


खोजते तो शायाद एक आशना 
उन अजनबियों में भी ढून्ढ लेते 
जो अपने किले हमें देख रेत कर चले थे 
मिलना मगर तुमसे इस वक़्त यहाँ था 


बुनते कुछ लम्हों को अपने ज़हन में आज 
कोरे कुछ पन्ने आशाओं के पार
ज़िन्दगी और दिलकशी मिल चली 
जहाँ दिखा तेरा अक्स निंदिया के पार 

Wednesday, January 4





चल दिए

एक दिन आया
खुद को पाया


खुद से जो मिले
सब कुछ आया


सब कुछ जो मिला
कुछ भी न मिला


जब कुछ न मिला
खुद को पाया


खुद से मिलकर
कुछ ख़ुशी हुई


कुछ ख़ुशी मिली
ग़म भी आया


ग़मगीन रहे ख़ुशी रूठ गयी
हँसना भूले रोना आया


रोते रोते रात गयी
सुबह उठे नया दिन आया


नए दिन का नया सुरूर था
फिर क्यूँ कल में जीने का फितूर था


जब सोचा तो समझ न आया
फिर रात ढली सपना आया


सपने जो थे अपने जो थे
गिन गिन कर उनको अपनाया


कुछ छूटे थे कुछ टूटे थे
आँखों में थे पर रूठे थे


कुछ खो कर भी कितना कुछ पाया
तुम जो आये, सब कुछ आया 


मंजिल भी मिली रस्ते भी दिखे
उन रास्तों पर खुद का पाया


दिए चल उस डगर पर, छोड़ पीछे अगर मगर, डर
राहों में हमारी तुम जो थे

Monday, July 18

 
पास

आँखों की आज भुझ्ती नहीं प्यास
दूर हो तुम और हर एक आस
कह भी दें, जो न कहें
चुप जो रहे,
न होंगे पूरे आज

पास तो है सब कुछ
बस दूरी के उतने ही 
जितने खुद के रहते थे करीब

चलते हुए चुभते कम हैं
जीते  जब तक, तब तक ग़म है
और ग़मों से कुछ हम कुछ तुम पूरे
और कुछ कम है

शामें गयी, पर तू नहीं
बंद आँखों में भी न है वोह यकीन
चुप करके कुछ बता दे आज
कहते कहते तो बोहत बोल गए
मगर सुनते तो आज कहाँ ग़म था ....

Tuesday, July 6



हासिल


आज फिर से नींद गवा बैठे
बंद आँखों में सपने सजा बैठे
खोये लम्हे अपने बना बैठे
फासलों को भूल कुछ और करीब हम जा बैठे...

कुछ सोचते कहाँ समझ पाते थे हम 
जो निकली थी दिल से
उन्ही दुआओं पे थे चलते कदम
रास्तों में भी मंजिल सजा बैठे
आज कुछ और खुद को गवा बैठे

चलते रहते तो सारे थे लगते हमें दूर
माँगा नहीं कुछ किया सबको क़ुबूल
सिर्फ एक छोटी सी आहट से बंधे
थे हरदम
आज उसे भी निसार हम कहाँ बैठे

होते थे पहले कई दिनों में वो दिन
जिनमे जागते थे हम भी तारे गिन-गिन
लेकिन आसमान में अब ना हैं
वो तारे शरीख,
जिनके लिए हम सपने जगा बैठे
कुछ लम्हों में ज़िन्दगी बिता बैठे

एक दिन खुद से पुछा ख़ामोशी के बाद
कहते नहीं बनता चुप रह के आज
क्यूँ धीरे धीरे रुकता है वक़्त
कुछ चेहरों के पास

सारे नसीब के आदि है
यूँ तोह ख़ामोशी में भी एक आजादी है 

मन में आशा थी उनसे दूर जाने की
उस अकेलेपन से खुद को बचाने की
मैं निस्संग था पर एकाकी नहीं
मेरा अकेलापन मेरा साकी सही

जो साथ न मेरा दे पाये, उनसे कब सूनी हुई डगर?
मैं भी न चलूँ तो क्या नहीं रहेंगी ये राहें अमर?

यहाँ सब भटकते हैं खुद से दूर जाने को
और हम ढूँढ़ते हैं खुद को पाने के कुछ मक़ाम 

जो चलते हैं, उन्हें चलने का स्वाद है
और ज़िन्दगी हमारी इस परिवर्तन से ही तो आबाद है

और तुम, तुम भी हो एक पहचान 
खुद को खोजने के लिए मेरा अभिमान

भूले बिसरे कुछ शब्द तो  है
उनकी मगर कहाँ कोई पहचान है
अपनों के बीच में भी हम खुद से अनजान है
क्या मोहसिन, और कौन मेहमान है?

नज़र में रहते हो जब तुम नज़र नहीं आते
आओ चलो, अब चलें खुद से दूर...

Tuesday, November 4













शायद...

सपनों की परतों में
आसमान के साए हैं
गेहुएं इस मंज़र की तस्वीर
से बेदाराख्त मुरझाएं मौसम
भी अब अपने हमसाये हैं

खुलते-सिमटते अश्कों में हम अशफाक
एक नफीस बज्म उनकी आहटों की लाये हैं
राहों में तोह थे मोती भी
मगर जहाँ नज़र थमी
बस उसी मिटटी की रौशनी,
हम राहगीर बन सिमटे ख्यालों की कश्ती
में बशर कर पाए हैं

मिले नही जो उनसे तोह क्या ग़म
वोह हमारे न भी हो सके
तोह क्या क्या हम उनके कुछ कम हैं?

जिनसे मिले हैं उनसे कितने जुड़ पाये हैं
और जिनको खो दिया ख़ुद की खोज में
उन्हें कैसे यादों से जोड़ पाएंगे?

शायद राह में कही खो दिया ख़ुद को
और कुछ मौसम से बदले रंग
हम कुछ टूटे सपने के हमसाये हैं
कितने आसमान सर पे
और कितने धरती क़दमों पे राहगीर है

उतरती चद्ती इस मिटटी की खुस्बो में
बी हर अक्स का इक इमान है

पूछें कितने ख्यालों से?
सहमे, गुज़रे, कुछ भूले बिसरे सालों से
खोज ये ऐसी जिसमे
खोजने वाले ही सबके भुलाएं हैं

पाने के क्या मायने और खोने
पर कितनी जुस्तजू तृप्त है?
हमसे तो खोज की परिभाषा है
जिसमें जीते तोह भी पाने को
कुछ अजीम, कितनी अनमोल है

फिर चले मूँद आँखें,
पराया सपनो को
खोज में उसकी, जिसने सिखाया मतलब
ज़िन्दगी का...

Friday, May 23




पंछी हूँ ...

उड़ने चला,
मैं हवाओं में समाने चला
रस्ते खुले
मैं तो चलता चला...

तुम ना मिले
मंजिलें घुल गई
मैं ख़ुद को भुला
और जो पाया नही था

उसी खोज में ख़ुद
को भूल चला

मंजिलें नही
रास्ते ही सही
रास्तों में मुसाफिर सा
चलता चला

साथी नही
है, तोः बस एक एहसास

गम भी नही
कैफियत से तृप्त है हमारी प्यास

कभी मिटने वाली
वो आस

जिसे संजोये
सोचते हैं हम
की क्या पाए बिना
हम तुम्हे खो पाएं हैं

उड़ान के दायरे
में है तुम्हारा घर
जिसमें से झांकती
है तुम्हारी खामोश नज़र

तुमने कह दिया तोह
ग़म के क्या पैमाने हैं
जो सब खमोशी में
सुन गए
क्या वोही सच में सयाने हैं?

दुःख की तकलीफ
की इनायत है
आने वाले पलों
के मौसम सुहाने हैं

क़ैद पिंजरों में
आज़ादी के मायने हैं
खुले आस्मान
केतोः रहनुमा सितारे हैं

उड़ान उन उन्मुग्द
परिंदों की ओर
ज़िंदगी है रौशनी उमीदों के साथ


यादों की मिटटी में
कितने दिन दिल बेह्लायेंगे
थोडी दूर तुम ले चलोगे

कुछ रास्ता हम ख़ुद बनायेंगे

थोडी दूर उड़
आकाश के सब संगी
बचपन के कुछ पंखों
पर सपनों सा कुछ दर्द पाले
कहाँ जायेंगे

इंतज़ार करना ज़मीन
हमारी शिद्दत की कसम
एक और आशियाँ हम बनायेंगे ...