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Wednesday, August 14


जाने दे


तुम तक
बस तुम तक
सारी मंजिलें 
सब रास्ते थे सीमीत 
बस तुम तक

अब तुम नहीं
तो नींदें धुआं हैं 
आँखें हैं बोझल 
सूना जहाँ है 

है आँखों में अब भी वो तस्वीर 
माना था जिसे खुदा 
जिससे किया दिल को ताबीर
और किया खुद को नफा

अब धडकनों में रूककर
तकदीर से झुक कर
आशाओं से मूक कर 
किया अलविदा कुछ अपनों को 

खुद क़त्ल कर कुछ सपनों का 
दहन किया हमदर्दी का 
आंसुओं में खोये जो थे
उनको भी कहा अब जाने दो

लम्बी नहीं ज़िन्दगी 
तो पल छोटे क्यूँ कर लें
इनमें जी कर
फिर चाहे जितने मौतें मर जायेंगे  

मर मिटे अभी हैं 
साँसों को पता नहीं 
थम कर अब बस
करना इंतज़ार है 

सिर्फ कुछ करना ही स्वीकार था हमको 
चुप रह कर बनती बात न थी
अब ख़ामोशी में लिपटे
मिटटी के इंतज़ार में 
शब्दों को ढूँढने बोलो कहाँ जाएँ?

सामने तो हो तुम
खुद में मगर तुम कहाँ
चाहा था जिसको तुममें
उसको ढूँढने बोलो अब किधर जाएँ?

Tuesday, September 11


अंत

कुछ यादों से जुड़े
कुछ लम्हों में खड़े
ज़िन्दगी से कुछ खफा
कुछ तुम पे अड़े

चुप रहकर ज़रा
किया अपने गुस्सा का एलान
जब तुम्हरी ख़ामोशी ने
किया हमें परेशान

वक़्त था वो कठिन
कुछ घड़ियाँ नाफरमान
बिखरते कुछ लम्हे
और कुछ हम नादान

एक अंतर्द्वंद
जिसमे हिम बागी थे
एक कश्ती जिसके हम नावी थे

अच्छे और बुरे का अंतर
कठिन समझ पाना था
दिल में बस एक ही गूँज थी
कुछ कर दिखाना था

मन में था विश्वास
कदमों को मंजिल का आभास
रुकने में था झुकने का डर
गिर के बिखरने का डर

ढूंढे एक ठिकाना
जहाँ न सिफर न बसर
पहुँचने के लिये जहाँ
हमें तो बस चलते जाना

आदतों से आदि
खुद ही लिखते गए अपनी बर्बादी
और चुप रह कर जब न बनी बात
तो लफ़्ज़ों से भी कर दिया आगाज़

तुम से ही शुरू 
तुम से ही आबाद
मेरी ज़िन्दगी की आखरी कड़ी
और हम एक कैदी
अपनी  बंदगी से आबाद