तुम तक
बस तुम तक
सारी मंजिलें
सब रास्ते थे सीमीत
बस तुम तक
अब तुम नहीं
तो नींदें धुआं हैं
आँखें हैं बोझल
सूना जहाँ है
है आँखों में अब भी वो तस्वीर
माना था जिसे खुदा
जिससे किया दिल को ताबीर
और किया खुद को नफा
अब धडकनों में रूककर
तकदीर से झुक कर
आशाओं से मूक कर
किया अलविदा कुछ अपनों को
खुद क़त्ल कर कुछ सपनों का
दहन किया हमदर्दी का
आंसुओं में खोये जो थे
उनको भी कहा अब जाने दो
लम्बी नहीं ज़िन्दगी
तो पल छोटे क्यूँ कर लें
इनमें जी कर
फिर चाहे जितने मौतें मर जायेंगे
मर मिटे अभी हैं
साँसों को पता नहीं
थम कर अब बस
करना इंतज़ार है
सिर्फ कुछ करना ही स्वीकार था हमको
चुप रह कर बनती बात न थी
अब ख़ामोशी में लिपटे
मिटटी के इंतज़ार में
शब्दों को ढूँढने बोलो कहाँ जाएँ?
सामने तो हो तुम
खुद में मगर तुम कहाँ
चाहा था जिसको तुममें
उसको ढूँढने बोलो अब किधर जाएँ?



