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Wednesday, August 14


जाने दे


तुम तक
बस तुम तक
सारी मंजिलें 
सब रास्ते थे सीमीत 
बस तुम तक

अब तुम नहीं
तो नींदें धुआं हैं 
आँखें हैं बोझल 
सूना जहाँ है 

है आँखों में अब भी वो तस्वीर 
माना था जिसे खुदा 
जिससे किया दिल को ताबीर
और किया खुद को नफा

अब धडकनों में रूककर
तकदीर से झुक कर
आशाओं से मूक कर 
किया अलविदा कुछ अपनों को 

खुद क़त्ल कर कुछ सपनों का 
दहन किया हमदर्दी का 
आंसुओं में खोये जो थे
उनको भी कहा अब जाने दो

लम्बी नहीं ज़िन्दगी 
तो पल छोटे क्यूँ कर लें
इनमें जी कर
फिर चाहे जितने मौतें मर जायेंगे  

मर मिटे अभी हैं 
साँसों को पता नहीं 
थम कर अब बस
करना इंतज़ार है 

सिर्फ कुछ करना ही स्वीकार था हमको 
चुप रह कर बनती बात न थी
अब ख़ामोशी में लिपटे
मिटटी के इंतज़ार में 
शब्दों को ढूँढने बोलो कहाँ जाएँ?

सामने तो हो तुम
खुद में मगर तुम कहाँ
चाहा था जिसको तुममें
उसको ढूँढने बोलो अब किधर जाएँ?

Saturday, November 26





शून्य 


एक अधूरी सी कविता
एक टूटा विचार
शब्दों की कैफियत 
एक बदलता संसार


एक खोया समय
एक बिछड़ी घडी
ज़िन्दगी की कसौटी
पे वक़्त के बदलते आसार


कुछ गूंजती आवाजें
खामोशियाँ कुछ
कुछ बहते से आकर


खोयी हुई परछाई 
मैली एक दीवार 
धुन्दला सा सबका प्यार
   
क्यूँ कुछ सुनना है
किस से छुपाया है
और किस तक पहुँचाना है


जो गुप्त है उसपे निशाना है
और जो ज़ाहिर... खैर पुराना है


मेरे तेरे में क्या पराया है?
जो नहीं खोया क्या उसे गवाया है?


ख्यालों से लड़ते तुम पर बिगड़ते 
दुनिया में बढ़ते 
ऐसे क़दमों पर कहाँ था संसार


आँसुओं की भी अपनी रफ़्तार है
जो बहते हैं धुल जाते हैं
नहीं धुलता तोह ये खुरदरा संसार 

खुद से खुद को न कर पाए अलग
तुम से खुद को लेकिन कर दिया जुदा


और अब खुद से कुछ खुद ही अनजाने हैं
पहचाने कुछ चेहरे हैं पर लगते बेगाने हैं 

हकीकत में पड़ती गिरती संभालती  
कुछ पन्नों में ढलती 
एक कविता क्या बनेगी इस जीवन का सार


शून्य से बने हम
शून्य से बना संसार


शून्य बन ढले हम
शून्य जब बना आकार

Saturday, October 3




अंकुश

उठते कुछ सवालों के साथ
बीते कुछ इरादों के सहारे
पानी में बहते कुछ तूफानों के बीच
हमने भी अपने इरादे उतारे

ज़मीन से फलक तक
खाव्हिशों की झलक तक
बिखरे कुछ पल, जो कल थे हमारे



कही अनकही और सुनी अनसुनी
और जो कह के भी
समझ पाये, कुछ ऐसे थे इशारे

जाने पहचाने, अपने बेगाने
ज़िन्दगी के नजराने
और कुछ बेखुदी के पैमाने

खो कर मिल जाने
और कुछ महफूज़ ख़ज़ाने

आज ज़िन्दगी की कशमकश में कितने
अनदेखे थे और अब हैं कितने अनजाने

चुप रहकर सोचें तो कितने गम हैं
बाहें फैलाये इस अँधेरे में आखिर कितने रंग हैं?

और कह कर अगर जग जायें रातें
तो सूरज बन क्या कल जग जायेंगे...

इस अंकुश से हर सवाल तक बढ़ते सब कदम हैं
न आये आंधियां तो भी ज़िन्दगी क्या पूरी है?

दूरियां और फासले खुद से भी क्या उतने ही ज़रूरी हैं?

Tuesday, August 12




वोह दिन...



कुछ पुराने पन्नो में
कुछ
सिरहानों के तले
बदलती ज़िन्दगी के मायनों से रूबरू
हमसे
नासार मौसम सो गए हैं

कुछ
थे हमने संभाले
कुछ
दिए थे तुम्हे
मगर इस खामोशी में सराबोर
वोह लम्हे खो गए हैं

जागती सी कुछ रातों
में
बहकती हवा के इशारों पे
मुन्तज़र
हम खो गए हैं

यादों
में तुम्हे तलाशते
और
तुम में ख़ुद को खोजते
हम
कितनी रातें रो गए हैं
पाने
चले थे प्यार ज़िन्दगी में
और
ज़िन्दगी के हो कर रह गए हैं

मगर आज यह दीवार
मैं गिराता हूँ
तुम्हे
भूलने की कोशिश में नाकामयाब
तुम्हे
ख़ुद के और भी करीब पाता हूँ

कहता हूँ
खामोश बन सह जाता हूँ
कुछ
मन में बुदबुदाते
ख्यालों
को सपनों में जगाता हूँ

उन दिनों की खोज में
कुछ
गुमसुम रातों में
जब
जाता हूँ दरवाज़े पे दस्तक देती
तुम्हारी
हर याद से मैं मिल जाता हूँ

भावनाओं
ने कुछ कहा है तुमसे
और उस जागते अतीत से
जिससे
मुखातिब हैं कुछ थमी साँसे
हमारे
बिताये हुए पल कुछ ऐसे ही हैं

खामोश पानी पे बिखरे
मोतियों के समान
ज़िन्दगी
के तराजू पे तुलता
खोया
हर एक अरमान...