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Saturday, November 26





शून्य 


एक अधूरी सी कविता
एक टूटा विचार
शब्दों की कैफियत 
एक बदलता संसार


एक खोया समय
एक बिछड़ी घडी
ज़िन्दगी की कसौटी
पे वक़्त के बदलते आसार


कुछ गूंजती आवाजें
खामोशियाँ कुछ
कुछ बहते से आकर


खोयी हुई परछाई 
मैली एक दीवार 
धुन्दला सा सबका प्यार
   
क्यूँ कुछ सुनना है
किस से छुपाया है
और किस तक पहुँचाना है


जो गुप्त है उसपे निशाना है
और जो ज़ाहिर... खैर पुराना है


मेरे तेरे में क्या पराया है?
जो नहीं खोया क्या उसे गवाया है?


ख्यालों से लड़ते तुम पर बिगड़ते 
दुनिया में बढ़ते 
ऐसे क़दमों पर कहाँ था संसार


आँसुओं की भी अपनी रफ़्तार है
जो बहते हैं धुल जाते हैं
नहीं धुलता तोह ये खुरदरा संसार 

खुद से खुद को न कर पाए अलग
तुम से खुद को लेकिन कर दिया जुदा


और अब खुद से कुछ खुद ही अनजाने हैं
पहचाने कुछ चेहरे हैं पर लगते बेगाने हैं 

हकीकत में पड़ती गिरती संभालती  
कुछ पन्नों में ढलती 
एक कविता क्या बनेगी इस जीवन का सार


शून्य से बने हम
शून्य से बना संसार


शून्य बन ढले हम
शून्य जब बना आकार